व्यंगात्मक - अंधेर नगरी.. चमत्कारी राजा !!!


गुंजन साहा की कलम से...

एक राज्य में एक राजा था, उसकी प्रजा बहुत खुश थी। राजा अपने प्रजा को पुत्रवत प्यार करता था। उसके योग्य मंत्री राजकाज में राजा का सहयोग करते थे। कम शब्दों में कहा जाये तो राज्य खुशहाल था।

राजा अपने मंत्रियो से सदैव अपने प्रजाहित के लिए चर्चा करता था। राजा ने कुछ मंत्रियो को राज्य भ्रमण के लिए भेजा ताकि प्रजा के सुख दुःख को समझा जा सके। मंत्रियों के प्रतिनिधि मंडल ने राज्य का भ्रमण किया। उन्होंने प्रत्येक चीजों का सुझ्म दृष्टी से अवलोकन किया। मंत्रियो का दल कुछ दिन उपरांत राजदरबार में पहुंचा। और उसने राजा को अपने अनुभव साझा किया। राजा भी उत्साहित थे। उन्हें भी जानना था की राज्य में क्या चल रहा है।

मंत्रियो के प्रतिमंडल के प्रमुख ने अपनी बात प्रारंभ की उसने कहा महाराज राज्य में सभी कुशल पूर्वक है। प्रजा आन्दित है लेकिन... लेकिन शब्द सुन राजा अपने सिंहासन में असहज महसूस करने लगे। राजा ने जोर देकर कहा लेकिन क्या मंत्री!!

मंत्री, लेकिन महाराज इतने सुख सुविधा में प्रजा आलसी हो गई है। वे अपने ही लोगो से दूर होते जा रहे है। सुख सुविधाओं ने प्रजा को सुस्त बना दिया है। राजा ने मंत्री की बात आधे में रोक कर कहा। छोड़ो इन बातों को मुख्य बिंदु पर आओ और मुझे बताओ की तुमने क्या देखा। 

मंत्री लम्बी सास लेते हुए कहा की महाराज मैं जब नगर में घूम रहा था तो देखा बरगद के पेड़ के निचे जो जमघट लगा करती थी अब वो नहीं है। कुये में महिलाये पानी लेने नहीं आ रही है। राज्य एकदम सुना सुना सा लग रहा है।

राजा अचंभित होकर पूछा ऐसा क्यों मंत्री ?

मंत्री ने कहा की आपने जो घर घर पेयजल की व्यवस्था कर दी है उससे अब बच्चे और महिलाये कुए में पानी लेने नहीं आ रही है। जिससे विचारों का आदान प्रदान नही हो पा रहा है। ऐसे करने से महिलाये अस्वस्थ हो जाएगी।

मंत्री की बातों ने राजा को सोचने पर विवश कर दिया। राजा जिज्ञासु स्वभाव से पूछा की और जो आप बता रहे थे की बरगद के पेड़ के निचे जमघट नहीं लग रही है उसका क्या ?

मंत्री अपनी बातों को पुनः प्रारंभ करते हुए कहता है की महाराज आपने बिजली की इतनी उत्तम व्यवस्था कर रखी है की लोग अब बरगद के पेड़ के निचे आते ही नहीं। बच्चे भी अब मोबाइल में ही खेलते और पढ़ते है। बड़े बुजुर्ग भी घर पर रह कर टीवी देखते है। ठंडी चलने वाली यंत्र लगा लिए है सो घर पर ही रह रहे है।

राजा अब काफी चिंतन मुद्रा में आ गये। उन्हें लगने लगा की मुझ से ही गलती हो रही है। ऐसा यदि चलता रहा तो नैतिक पतन संभव है। राजा जिज्ञासु नजर से मंत्रियो को देखने लगा की क्या किया जाए। सभी और देखते हुए राजा ने कहा इस विकट स्थिति से कैसे निकला जाये, कृप्या आपलोग मिल कर सलाह दे। 

सभी मंत्री अपने प्रतिनिधि प्रमुख की ओर देखने लगे। प्रतिनिधि मुख्य को भी लगने लगा की उसकी योग्यता आज काम आने वाली है। सो वो अपने बातों को रखने लगा।

मंत्री ने कहा महाराज सर्वप्रथम आप पेय जल की व्यवस्था को बंद करवाये। जिससे महिलाये और बच्चे कुए में आने लगेंगे। बाकी जो बिजली की व्यवस्था आपने कर रखी है उसे मै पड़ोसी राज्य से कह कर कटवा देता हूँ।

राजा निश्चिन्त होते हुए कहता है मंत्री महोदय अब राज्य को सँभालने की सारी जिम्मेदारी आपकी, आपको जो उत्तम लगे आप करें। कहते हुए राज्य सभा को भंग किया गया। 

मंत्री राजा के वचनों से ओतप्रोत हो गया। उसने सर्वप्रथम सैनिक को बोल कर पेय जल की व्यवस्था को बंद करवा दिया और चल पड़े पड़ोसी राज्य। पड़ोसी राज्य पहुच कर उसने बिजली से सम्बंधित मंत्री से मिलकर राज्य की बिजली काटने को कहा। पड़ोसी राज्य के मंत्री इस बात पर अचंभित हो गये। उन्होंने कहा की मंत्री जी ये आप क्या कर रहे है। आप अपने प्रजा को क्यों कष्ट देना चाहते है। इस पर मंत्री ने कहा की जो बोला जा रहा है आप करें महाशय, साथ ही आप भी अपने प्रजा को इतने सुख सुविधा ना दे, नहीं तो आपकों भी बाद में परेशानी हो सकती है।इतना कह मंत्री पड़ोसी राज्य से अपने को गर्वान्वित मान कर चले आये। 

अब अगले सुबह राजा अपने महल से और मंत्री अपने आवास से प्रजा को देखने लगे। पानी के लिए हाहाकार मच गई। लोग इधर उधर भटके लगे। कुए की ओर सब दौड़ पड़े। गर्मी के मौसम में कुए में भी जल नहीं मिला। बूढ़े बुजुर्ग भी परेशान होने लगे। लोगों को समझ में नहीं आने लगा की क्या हो रहा है। बिजली भी काट दी गयी है। सभी बरगद पेड़ के निचे आ कर बैठ गए। कुए और बरगद पेड़ के निचे लगे भीड़ ने राजा और मंत्री के चहरे में प्रसनता ला दी।

अब राजपाट का समय होने लगा था। मंत्री अपने घर से राजभवन के लिए निकलेंगे। उसने घर में आवाज लगाई मुझे राज भवन निकलना है जल्दी से पानी और कपड़े निकाल दो। घर के भीतर से आवाज आई आज तो पानी आई नहीं जिससे खाना भी नहीं बना पाई। देखती हु किसी को कुए में भेज कर पानी मांगती हु। आप राजभवन में ही खा लेना। 

मंत्री बेचारा बिना खाये पिये ही राजभवन के लिए निकला। मंत्री की पालकी निकली, पालकी को निकलता देख प्रजा ने उन्हें घेर लिया। कई सवाल होने लगे। मंत्री मात्र इतना ही कह पाये की मैं राजभवन जा रहा हूँ आ कर देखता हूँ। रास्ते में लोग पानी और बिजली ना आने के लिए रास्ते में इधर उधर घुमने लगे। जिससे मंत्री की पालकी को राजभवन में पहुचने में काफी समय लग गया। उधर राजा राज भवन में मंत्री का इंतजार कर रहे थे की प्रजा के आव भाव से परिचित हो सके।

मंत्री को देख राजा  प्रसन्न हुए और मंत्री से पूछ बैठे मंत्री जी कितनी देर लगा दी आने में। मंत्री जी ने राजा को प्रणाम किया आसन ग्रहण कर सुस्ताते हुए बोलने लगे, धन्य हो महाराज, धन्य हो...

आप महान है, आप कृपावान है, आप त्रिकाल दर्शी है, आप में भुत और भविष्य देखने की विशेष योग्यता है। आपने तो एक ही दिन में सारी समस्याओं का निदान कर दिया, आप धन्य है। महाराज की जय हो... महाराजा की जय हो.. जय हो.... जय हो....

पूरा राजभवन राजा के जयकार से गुंजायमान हो गया। राजा सिंहासन पर बैठे अपने को योग्यता के शीर्ष में महसूस करने लगे। कभी वो मुस्कुराते कभी राजभवन में उपस्थित लोगों की ओर देखते तो कभी तलवार की मयान को सहलाते। जयकार लगाते - लगाते मंत्रीगण भी थक चुके थे, लेकिन राजा अपनी प्रशंसा से संतुष्ट नही हुए थे। उन्हें तो तब तक संतुष्टि नहीं मिलने वाली थी जब तक की उससे तेज ध्वनी से जयकार ना लग जाये, जैसे की बिजली चमकने से गर्गाराहट ना हो जाए। 

पहले अंक में इतना ही, अगले अंक में पढ़ेंगे की प्रजा रात कैसे बिताती है.....

तब तक के लिए धन्यवाद..

आपको अंधेर नगरी .... चमत्कारी राजा!!! अंक कैसा लगा हमें कमेंट कर अवश्य बताये, यदि अच्छी लगी हो तो शेयर अवश्य करें...

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